लेना और देना

सुख लेनेसे अन्त:करण अशुद्ध होता है और सुख देनेसे अन्त:करण शुद्ध होता है॥५७८॥

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इस संसार-समुद्रसे जो लेना चाहता है, वह डूब जाता है और जो देना चाहता है, वह तर जाता है॥५७९॥

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‘देने’ के भावसे समाजमें एकता, प्रेम उत्पन्न होता है और ‘लेने’ के भावसे संघर्ष उत्पन्न होता है॥५८०॥

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‘देने’ का भाव उद्धार करनेवाला और ‘लेने’ का भाव पतन करनेवाला होता है॥५८१॥

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शरीरको ‘मैं’, ‘मेरा’ अथवा ‘मेरे लिये’ माननेसे ही ‘लेने’ का भाव उत्पन्न होता है॥५८२॥

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केवल सेवा करनेके लिये ही दूसरोंसे सम्बन्ध रखो। लेनेके लिये सम्बन्ध रखोगे तो दु:ख पाना पड़ेगा॥५८३॥

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लेकर दान देनेकी अपेक्षा न लेना ही बढ़िया है॥ ५८४॥

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लेकर देनेकी अपेक्षा न लेनेका बड़ा भारी पुण्य है। पर इस बातको समझनेवाले बहुत कम हैं!॥५८५॥

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संसारसे कुछ भी लेना पाप है और देना पुण्य है॥ ५८६॥

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सुख लेनेके लिये शरीर भी अपना नहीं है और सुख देने (सेवा करने)-के लिये पूरा संसार अपना है॥५८७॥

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लेनेकी इच्छासे मनुष्य दास हो जाता है और केवल देनेकी इच्छासे मालिक हो जाता है॥५८८॥

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लेनेके भावसे भोग होता है और देनेके भावसे योग होता है॥५८९॥

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शरीरको आवश्यकतानुसार अन्न-जल-वस्त्र तो देना है, पर शरीरसे सम्बन्ध जोड़कर अन्न-जल-वस्त्र लेनेवाला नहीं बनना है। लेना बन्धन है और देना मुक्ति है॥५९०॥