श्रद्धेय श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दार
• विषय सूची •
- 1 निवेदन ❯
- 2 भगवान्के भजनकी महिमा ❯
- 3 भोग, मोक्ष और प्रेम सभीके लिये भजन ही करना चाहिये ❯
- 4 भजन—साधन और साध्य ❯
- 5 भजनके लिये श्रद्धापूर्वक प्रयत्न करना चाहिये ❯
- 6 भजनसे ही जीवनकी सफलता ❯
- 7 भवसागरसे तरनेका उपाय—एकमात्र भजन ❯
- 8 लगन होनेपर भजनमें कोई बाधा नहीं दे सकता ❯
- 9 नामसे पापका नाश होता है ❯
- 10 नामनिष्ठाके सात मुख्य भाव ❯
- 11 श्रीभगवान् ही गुरु हैं—भगवन्नामकी महिमा ❯
- 12 भगवन्नामका महत्त्व ❯
- 13 जप परम साधन है ❯
- 14 भगवान्के नामोंमें कोई छोटा-बड़ा नहीं ❯
- 15 भवरोगकी दवा ❯
- 16 भगवच्चिन्तनसे बेड़ा पार ❯
- 17 कीर्तन और कथासे महान् लाभ ❯
- 18 भगवान्के लिये अभिमान छोड़ो ❯
- 19 महान् गुण भक्तिसे ही टिकते हैं ❯
- 20 भगवत्कृपासे भगवत्प्रेम प्राप्त होता है ❯
- 21 श्रीगोपांगनाओंकी महत्ता ❯
- 22 गोपीभावकी प्राप्ति ❯
- 23 प्रेममें विषय-वैराग्यकी अनिवार्यता ❯
- 24 प्रियतम प्रभुका प्रेम ❯
- 25 सिद्ध सखीदेह ❯
- 26 प्रेमास्पद और प्रेमी ❯
- 27 प्रेम मुँहकी बात नहीं है ❯
- 28 श्रीकृष्ण-भक्तिकी प्राप्ति और काम-क्रोधके नाशका उपाय ❯
- 29 प्रियतमकी प्राप्ति कण्टकाकीर्ण मार्गसे ही होती है ❯
- 30 गीतगोविन्दके अधिकारी ❯
- 31 नि:संकोच भजन कीजिये ❯
- 32 सभी अभीष्ट भजनसे सिद्ध होते हैं ❯
- 33 भगवद्भजन सभी साधनोंका प्राण है ❯
- 34 जीव भजन क्यों नहीं करता? ❯
- 35 भजनकी महत्ता ❯
- 36 श्रेय ही प्रेय है ❯
- 37 आत्मविसर्जनमें आत्मरक्षा ❯
- 38 मनुष्य-जीवनका उद्देश्य ❯
- 39 भगवत्-सेवा ही मानव-सेवा है ❯
- 40 मन-इन्द्रियोंकी सार्थकता ❯
- 41 प्रतिकूलतामें अनुकूलता ❯
- 42 भगवान्का मंगल-विधान ❯
- 43 भविष्यके लिये शुभ विचार कीजिये ❯
- 44 परिस्थितिपर फिरसे विचार कीजिये ❯
- 45 दूसरेके नुकसानसे अपना भला नहीं होगा ❯
- 46 किसीको दु:ख पहुँचाकर सुखी होना मत चाहो! ❯
- 47 बदला लेनेकी भावना बहुत बुरी है ❯
- 48 निन्दनीय कर्मसे डरना चाहिये, न कि निन्दासे ❯
- 49 निन्दासे डर नहीं, निन्दनीय आचरणसे डर है ❯
- 50 पाप कामनासे होते हैं—प्रकृतिसे नहीं ❯
- 51 काम नरकका द्वार है ❯
- 52 बुराईका कारण अपने ही अंदर खोजिये ❯
- 53 मनुष्य-शरीर पाप बटोरनेके लिये नहीं है ❯
- 54 परदोष-दर्शनसे बड़ी हानि ❯
- 55 संकुचित स्वार्थ बहुत बुरा है ❯
- 56 पापसे घृणा कीजिये ❯
- 57 संकटमें कोई सहायक नहीं होगा ❯
- 58 उपदेशक बननेके पहले योग्यता-सम्पादन करना आवश्यक है ❯
- 59 साधकोंके भेद ❯
- 60 परमार्थके साधन ❯
- 61 सच्चे साधकके लिये निराशाका कोई कारण नहीं ❯
- 62 श्रेष्ठ साध्यके लिये श्रेष्ठ साधन ही आवश्यक है ❯
- 63 साधनका फल ❯
- 64 शान्ति कैसे मिले? ❯
- 65 त्यागसे शान्ति मिलती ही है ❯
- 66 भगवच्चिन्तनमें ही सुख है ❯
- 67 प्रसन्नता-प्राप्तिका उपाय ❯
- 68 सुख-शान्ति कैसे हो? ❯
- 69 शाश्वत शान्तिके केन्द्र भगवान् हैं ❯
- 70 शान्तिका अचूक साधन ❯
- 71 धनसे शान्ति नहीं मिल सकती ❯
- 72 सेवाका रहस्य ❯
- 73 अपनी शक्ति-सामर्थ्यसे सदा सेवा करनी चाहिये ❯
- 74 सेवा और संयमसे सफलता ❯
- 75 दु:खियोंकी सेवामें भगवत्सेवा ❯
- 76 कुछ प्रश्नोत्तर ❯
- 77 कुछ आध्यात्मिक प्रश्न ❯
- 78 कुछ पारमार्थिक प्रश्नोत्तर ❯
- 79 प्रार्थनाका महत्त्व ❯
- 80 प्रार्थना ❯
- 81 विश्वासपूर्वक प्रार्थनाका महत्त्व ❯
- 82 गुरु कैसे मिले ❯
- 83 भगवान् परम गुरु हैं ❯
- 84 भोग-वैराग्य और बुद्धियोग-बुद्धिवाद ❯
- 85 जीवनमें उतारने लायक उपदेश ❯
- 86 पीछे पछतानेके सिवा और कुछ भी न होगा ❯
- 87 जगत्की असारता ❯
- 88 संयोगका वियोग अवश्यम्भावी है ❯
- 89 आसक्तिनाशके उपाय ❯
- 90 भोगत्यागसे ही इन्द्रियसंयम सम्भव है ❯
- 91 ब्रह्मज्ञान या भ्रम ❯
- 92 चार द्वारोंकी रक्षा ❯
- 93 चार काम अवश्य कीजिये ❯
- 94 तीन श्रेष्ठ भाव ❯
- 95 तीन विश्वास आवश्यक हैं ❯
- 96 आत्मा अनश्वर है और देह विनाशी है ❯