दया—धर्मका स्वरूप

परे वा बन्धुवर्गे वा मित्रे द्वेष्ये रिपौ तथा।

आपन्ने रक्षितव्यं हि दयैषा परिकीर्तिता॥

(अत्रिस्मृति ४१)

दूसरोंमें हो, बन्धु-बान्धवोंमें, मित्रोंमें या द्वेष रखनेवालोंमें अथवा—चाहे वैरियोंमें हो— किसीको भी विपत्तिग्रस्त देखकर उसकी रक्षा करना ‘दया’ कहलाता है।

न हि प्राणै: प्रियतमं लोके किंचन विद्यते।

तस्मात् प्राणिदया कार्या यथाऽऽत्मनि तथा परे॥

(महाभारत, अनुशासन० १४५)

संसारमें प्राणोंके समान प्रियतम दूसरी कोई वस्तु नहीं है। अत: समस्त प्राणियोंपर दया करनी चाहिये। जैसे अपने ऊपर दया अभीष्ट होती है, वैसे ही दूसरोंपर भी होनी चाहिये।

अमित्रमपि चेद् दीनं शरणैषिणमागतम्।

व्यसने योऽनुगृह्णाति स वै पुरुषसत्तम:॥

कृशाय कृतविद्याय वृत्तिक्षीणाय सीदते।

अपहन्यात् क्षुधां यस्तु न तेन पुरुष: सम:॥

(महाभारत, अनुशासन० ५९। १०-११)

शत्रु भी यदि दीन होकर शरण पानेकी इच्छासे घरपर आ जाय तो संकटके समय जो उसपर दया करता है वही मनुष्योंमें श्रेष्ठ है।

विद्वान् होनेपर भी जिसकी महान् आजीविका क्षीण हो गयी है तथा जो दीन, दुर्बल और दु:खी है, ऐसे मनुष्यकी जो भूख मिटा देता है, उस पुरुषके समान पुण्यात्मा कोई नहीं है।

दया देखती नहीं जाति-कुल, मनुज-पक्षि-पशु-मित्र-अमित्र।

देश-धर्म, निज-पर, बान्धव-अरि, उच्च-नीच, धनवान-दरिद्र॥

बुध-जड, बाल-वृद्ध, नारी-नर, भेद-भाव-विरहित सर्वत्र।

अपना दु:ख बना देती पर-दु:ख, जगाती भाव पवित्र॥

लग जाता फिर मानव उस निज-दु:ख मिटानेमें तत्काल।

करता पूर्ण प्रयत्न, शक्तिभर, स्वाभाविक, न बजाता गाल॥

रहता निरभिमान वह, प्रभुकी इसे मानता कृपा विशाल।

अपना दु:ख मिटाकर, अपने ही हो जाता परम निहाल॥